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Tuesday, October 14, 2008

ज़रा सा आओ न बैठो, वतन की बात करें....

ये अल्फाज़ है गुलज़ार साहब की कविताओं और कहानियों पर आधारित नाटक 'खराशें' के..... और हाल फिलहाल मशाल इसी नाटक की तैयारी में जुटा हुआ है...... तैयारी है 'अभिनय' नाट्योत्सव की.....

सलीम आरिफ द्बारा संकलित 'खराशें' बंटवारे से अब तक हिन्दुस्तान में फैली फिरकावाराना वहशत को दर्शाता है...... नाटक की तीन कहानियाँ 'रावी पार', 'खौफ' और 'खुदा हाफिज़' हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं..... पाँच किरदारों के इस नाटक में ध्वनि और प्रकाश का बेशतर इस्तेमाल करने का ख्याल है.....

सात महीने पीछे चलें तो अभिनय - ०७ में हमनें 'सिफर' का पहला मंचन किया था और माशाअल्लाह ढेर सारे इनामात भी जीते थे....... इंशाअल्लाह इस बार भी कोशिश है...... नवम्बर की पहली या दूसरी तारीख को प्रथम चरण होगा..... उम्मीद है की ८ नवम्बर को अन्तिम चरण में हम जे.एस.एस के प्रेक्षागृह में 'खराशें' का मंचन करेंगे...... आपकी दुआ रही तो उम्मीद ज़रूर कामयाब होगी......


प्रणाम